राम-राम किसान भाईयों! रबी सीज़न की शुरुआत हो चुकी है। सरसों और गेहूं के साथ-साथ 'चना' (Gram) हमारे इलाके की एक ऐसी शानदार फसल है, जो कम पानी और कम लागत में भी किसान को बहुत अच्छा मुनाफा (Cash Crop) दे सकती है।
लेकिन चने की खेती में किसानों की सबसे बड़ी शिकायत यह होती है कि "फसल तो अच्छी खड़ी थी, लेकिन अचानक पौधे सूखने लगे" (जिसे उकठा या Wilt रोग कहते हैं)। आज हम जानेंगे कि चने की बुवाई के समय कौन सी ऐसी सावधानियां बरतें और किन नई किस्मों का चुनाव करें, जिससे न पौधे सूखें और पैदावार भी 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ तक निकले।
1. चने की बुवाई का एकदम सही समय
चने की फसल को न ज़्यादा गर्मी पसंद है और न ही बहुत ज़्यादा ठंड। इसलिए इसकी बुवाई का समय बहुत अहम है:
- असिंचित क्षेत्र (जहां पानी कम है): अगर आप बारानी (बिना सिंचाई वाले) खेत में चना बो रहे हैं, तो 1 अक्टूबर से 15 अक्टूबर के बीच बुवाई कर दें ताकि ज़मीन की नमी का पूरा फायदा मिल सके।
- सिंचित क्षेत्र (जहां पानी की सुविधा है): 25 अक्टूबर से 15 नवंबर तक का समय सबसे बेहतरीन माना जाता है।
2. चने की टॉप 4 उन्नत और रोग-प्रतिरोधी किस्में (Varieties)
चने में उकठा रोग (सूखने की बीमारी) से बचने का सबसे पहला तरीका है— सही और नई किस्म का चुनाव। पुरानी घर की किस्मों को बोना बंद करें और इन नई किस्मों को आज़माएं:
- GNG 2144 (तीज): यह श्रीगंगानगर (राजस्थान) और आस-पास के इलाकों के लिए बहुत शानदार किस्म है। दाना मोटा होता है और पैदावार अच्छी है।
- RVG 202 और RVG 203: मध्य प्रदेश और राजस्थान के लिए यह बहुत ही मशहूर किस्म है जो उकठा रोग (Wilt) के प्रति काफी सहनशील है।
- GNG 1581 (गणगौर): यह सिंचित और असिंचित, दोनों क्षेत्रों के लिए एक बहुत ही भरोसेमंद किस्म है।
- RSG 888: असिंचित (सूखे) इलाकों के लिए यह किस्म वरदान है। यह कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती है।
3. बीज उपचार (Seed Treatment) है सबसे बड़ा हथियार
प्रो टिप (Pro Tip): किसान भाईयों, चने में पौधे सूखने की बीमारी (उकठा/Wilt) ज़मीन और बीज के फंगस से आती है। अगर आपने बीज उपचार नहीं किया, तो बाद में कोई भी स्प्रे इस बीमारी को नहीं रोक सकता।
- फफूंदनाशक से उपचार: बुवाई से पहले 1 किलो बीज को 2.5 ग्राम 'ट्राइकोडर्मा' (Trichoderma) या 'कार्बेन्डाजिम + मैनकोज़ेब' से ज़रूर मिलाएं।
- कल्चर से उपचार (पैदावार बढ़ाने के लिए): फफूंदनाशक मिलाने के बाद बीज को 'राइजोबियम कल्चर' (Rhizobium Culture) से उपचारित करें। यह हवा से नाइट्रोजन खींचकर पौधों की जड़ों में जमा करता है, जिससे खाद का खर्च बचता है और पैदावार बढ़ती है।
4. खाद का गणित (चने को यूरिया नहीं, फास्फोरस चाहिए)
चना एक दलहनी (Dal) फसल है, इसलिए इसकी जड़ें अपनी नाइट्रोजन खुद बना लेती हैं।
- बुवाई के समय खेत में ज़्यादा यूरिया डालने की गलती न करें।
- चने को सबसे ज़्यादा ज़रूरत फास्फोरस (Phosphorus) की होती है। एक एकड़ में लगभग 50 किलो सिंगल सुपर फास्फोरस (SSP) और 10 किलो यूरिया का इस्तेमाल करें। SSP डालने से फसल को फास्फोरस के साथ-साथ सल्फर भी मिल जाता है। (सटीक जानकारी के लिए अपने खेत की मिट्टी की जांच कराएं।)
5. पानी कब लगाएं? (सिंचाई का सही समय)
चने को बहुत कम पानी की ज़रूरत होती है। ज़्यादा पानी देने से पौधे की लंबाई (Vegetative growth) बढ़ जाती है और फूल कम आते हैं।
- पहला पानी: बुवाई के 40-45 दिन बाद (फूल आने से ठीक पहले) दें। फूल आते समय कभी भी सिंचाई न करें, वरना फूल झड़ जाएंगे।
- दूसरा पानी: 70-75 दिन बाद (जब फलियों में दाना बनना शुरू हो)।
निष्कर्ष
किसान भाईयों, चने की खेती में अगर आपने 'बीज उपचार' और 'सही किस्म' का चुनाव कर लिया, तो आपकी आधी मेहनत वहीं सफल हो जाती है। इसके बाद बस सही समय पर सिंचाई करें और बंपर पैदावार लें! रोज़ाना अपनी नज़दीकी मंडी में चने और अन्य फसलों का ताज़ा भाव जानने के लिए हमारी वेबसाइट FasalBhav.in पर विज़िट करते रहें।
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